Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University

Department of Ancient History


गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना (1957) के साथ ही प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्क़ति विभाग का आरम्भ हुआ। इस विभाग का अपना भवन पूर्वायतन है। आज पूर्वायतन के प्रांगण का सुन्दर मनोहारी परिवेश अपने सम्रद ग्रन्थालय-वाचनालय एवं अमूल्य पुरा सम्पदा के साथ सुसम़द्व पुरातत्व संग्रहालय से तो अलंक़त है ही, इस विभाग की अकादमिक प़ष्ठभूमि प्रारम्भ से ही प्रशस्त व गरिमामयी रही है।

    इस विभाग के आदि आचार्यो ने ब़हत्तर आलोक में प्राच्य विद्या विषयक अनुसन्धान के लिये पुराभाषा वैज्ञानिक प्रविधि के साथ विद्वज्जगत को एक नई संदिष्टि प्रदान की। पुरातत्व वैज्ञानिक सर्वेक्षण - उत्खनन कार्यो विशेषत सोहगौरा (गोरखपुर) तथा फाजिलनगर-सठियॉव (कुशीनगर) और बाद में बीरभारी के उत्खनन हुये और हिमालय के इस तराई से जुडे क्षेत्र के साथ विन्ध्य गंगा घाटी की ऐतिहासिक ही नही पुरा वैदिक प्रागैतिहासिक सांस्क़तिक धाराओं पर प्रकाश पडा। परिणामत यह विभाग प्राच्य विद्या का एक प्रशस्त केन्द्र बनता गया।

    पूर्वायतन की अन्यानेक बौद्विक उपलब्ध्यिा इस प्रकार है- यहॉ विगत दशकों में अनेक विद्वत, परिषदों के वार्षिक अधिवेशन संगोष्ठिया एवं वर्कशाप सम्पन्न हुये।

ग्रन्थालय - वाचनालय में 4000 से अधिक प्राच्यविद्या विषयक ग्रंथ एवं जर्नल्स संग़हीत हैं। इसी तरह पुरातत्व-संग्रहालय में गोरखपुर परिक्षे् के ऐतिहासिक स्थलों के उत्खनन एवं सर्वेक्षण से उपलब्ध अमूल्य पुरासम्पदा संग़हीत है जो विद्वानों, शोधकर्ताओं - विद्यार्थियों के लिये एक वरदान है। ये अवशेष नूतन पाषाणयुगीन - आदैतिहासिक युगीन संस्क़तियों से लेकर ऐतिहासिक युगों तक का उदघाटन करते है।

 

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